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तुम तो बहकी नदी लग रही हो

तुम तो बहकी नदी लग रही हो
मै तो सूखा हुआ हूँ जलाशय ।
रेत की जो बनायी इमारत 
तू गिराती नही समझी आशय ।।
पंख उडने से पहले जले है
भावनाओं का सागर पले है ।
अनकही सी कहानी है जीवन
मेरे जज्बात पैरो तले है ।।

यह कथा कैसे किसको सुनाऊँ 
दर्द छलके या ऑसू दिखाऊँ ।
दीप ही जब मेरा घर जलाये
कैसे कोई दिवाली मनाऊँ ।।

प्रेम की रीत पर मन की छोटी कला ।
कुछ मिला ही नही जाने क्या-क्या जला ।
मै अकेला नही जाने कितने है वो
मेरा तो सब गया काश उनका टला ।।
डा दीनानाथ मिश्र

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5 Comments

Gunjan Kamal

03-Jul-2023 06:39 AM

👏👌

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बहुत सुंदर रचना

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Abhinav ji

01-Jul-2023 07:58 AM

Very nice 👍

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